Saturday, November 15, 2008

तेरी मज़बूरी..

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उदास राते बितायी हमने...मजबूर आँखे जब तेरी देखी

हसीन सपने सब तोड़ डाले...राहों में तेरी जब शूल आए..

खवाब अपने ही मसल डाले...ना उमीदी ने जब हाथ बढाए
गैरो की बेवफाई का क्या शिकवा ...अपनी वफ़ा ही ना जब रास आए..

दिल के टुकड़े हो गए हजारो.. वो काली रात जब याद आए
दर पे सदके किए थे कितने ..अश्को के हमने मोती बहाए..

वफ़ा--मोहोबत में रोते रहे हम..वफ़ा की चिलमन में दिल जलाए..
शोला बन गया प्यार का गम .नासूर बन जख्म सब रिसने को आए..

तेरी मोहोबात कैसे भुला दे...तुझ से ही थे गम ने चैन पाये..
आज मोहोब्बत भी रोती है मेरी...तेरी मज़बूरी जब मुझको सताए..

4 comments:

bahadur patel said...

gahari koi chot hai.jo muhabbat me khai hai . sundar.

makrand said...

वफ़ा-ऐ-मोहोबत में रोते रहे हम..वफ़ा की चिलमन में दिल जलाए..
शोला बन गया प्यार का गम .नासूर बन जख्म सब रिसने को
lets make grammer correct
keep wriring
regards

taanya said...

BAHADUR PATEL JI

ha.ha.ha. bahut khoob laga apka rev. aur shukriya pasand karne k liye..

MAKRAND JI...

Aapne likha LETS MAKE GRAMMER CORRECT..

per aapne bataya nahi...kaha.kaha correction ki jarurat hai...

thanks vivechna karne aur utsaah badhane k liye...

thanks a lot both of u..

sangeeta said...

taanya,
aapki ye rachna aisa ehsaas kara rahi hai ki aap jise dil au jaan se jise chaahti hain usaki kisi majboori se dukhi hain..........
muhabbat ka khoobsurat jazba hai....
dil ke jazbaat bahut sundar shabdon men piroti hain...padhte hue aapka dard mahsoos hota hai.