Sunday, October 19, 2008

जख्मी दिल.....

जख्मी था दिल तो जख्मी रहने दिया होता...
आज मगर मुझे यु तन्हाइयो से लड़ना तो ना होता...

मैंने तुमको चाहा, इबादत की, देवता बनाया क्यों..
बिना मूरत के मन्दिर सा खाली मकान रहने दिया होता..

अश्क थे, बदकिस्मती थी, ग़लत फैसले थे जिंदगी के..
यू सोच कर ख़ुद को समझाते थे, यू ही रहने दिया होता..

गए हो जब से तुम मेरी दुनिया में, दोस्त बन कर..
जुदाई है, दर्द है, और अब तुम बिन फैली तन्हाई है..

खुशी है आंसू है, हर तरफ़ बस बैचैनी है..
जिंदगी की बेइंतेहा बंदिशे है, और हर दम एक खलिश है..

अजीबो गरीब हाल है, ना मौत है ना जिंदगी है..
आज है तो बस दूर तक फैला अकेलापन है..!!

2 comments:

sangeeta said...

jab tumhaari zindagi men aa gaya hai koi dost ban ke ,
to kyun judai hai , kyun dard hai aur kyun faili tanhayi hai?
samajh nahi aaya mujhe ye raaz teri zindagi ka ,
kyun har raah par tune thokar hi khaai hai?

dard se labrez hai ye rachna..
kya kahoon aur kya taareef karoon?
god bless u

संवेदनाऍं said...

इतनी उदासी तौबा तौबा। लेकि‍न अच्‍छा लि‍खा है। बधाई.........