Wednesday, September 17, 2008

सात फेरों का छल ....

न जाने वो कैसे छली गई???
अपने भाग्य की रेखाओं से??

उसने तो भरोसा किया था खुदा पर
खुदा का फ़ैसला मान सर झुकाती गई...

उफ़ ये क्या खता हो गई...
सात फैरो क बंधन मे वो छली गई...!!

उम्र भर के गमो की सल्लाखो मे देखो..
बे-गुनाह...मासूम वो कैद हो गई....!!

त्याग कर के भी कई उसे दुत्कारे मिली...
न-समझ बन्दे की वो साथी बनी..

एहसास जिसको नही था..न समझ थी कोई..
एक वहशत थी जो पविर्त्र बंधन का मकसद बनी..

न अच्छा बेटा..न पति..न अच्छा पिता बन सका..
जिसकी खातिर वो सुकोमला...उसकी भार्या बनी...

बे-दर्द रस्म-ओ-रिवाजों तले बच्चो की खातिर वो घुटने लगी..
अभिशापित सा जीवन बिताना था उसको..बिताती रही..

उम्र भर के गमो की सल्लाखो मे देखो..
बे-गुनाह...मासूम वो कैद हो गई....!!

उफ़ ये क्या खता हो गई...
सात फैरो क बंधन मे वो छली गई...!!

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